अति प्राचीनतम सेवराई गढ़ी ग्राम रामलीला समित द्वारा शनिवार को श्री राम जन्म, ताड़का वध ,अहिल्या उद्धार व गंगा अवतरण रामलीला का सजीव मंचन किया गया


सेवराई । स्थानीय तहसील के अति प्राचीनतम सेवराई गढ़ी ग्राम रामलीला समित सेवराई द्वारा शनिवार की रात्रि श्री राम जन्म, ताड़का वध ,अहिल्या उद्धार व गंगा अवतरण रामलीला का सजीव मंचन किया गया ।
रामलीला की शुरुआत पृथ्वी पर निश्चचरों के अत्याचार से आतंकित ऋषि महर्षि देव आदि विचार कर रहे थे कि निश्चचरों से मुक्ति कैसे मिलेगी सभी देवगण व ऋषि महर्षि भगवान विष्णु की आराधना करने लगे उसी समय आकाशवाणी हुई की मैं अपने अंशो सहित अयोध्या नरेश महाराज दशरथ के पुत्र के रूप में पृथ्वी का भार हरण करने के लिए शीघ्र ही अवतरित हो रहा हूं।

उधर अयोध्या नरेश महाराज दशरथ अपने उत्तराधिकारी के लिए एक भी पुत्र नहीं होने की चिंता में गुरु वशिष्ट से अपनी चिंता का कारण बताए ।तो गुरु वशिष्ठ ने महाराज दशरथ को श्रृंगी ऋषि को बुलवाकर यज्ञ कराने के बाद चौथेपन में महाराज दशरथ को चार पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई और भाई प्रगट कृपाला से पूरा पंडाल श्री राममय हो गया।

उधर देवगण व महर्षियों के यज्ञों की विध्वंस करने का सिलसिला अभी भी निश्चचरों द्वारा जारी था । महर्षि विश्वामित्र अयोध्या नरेश महाराज दशरथ के दरबार में पहुंचकर राम लक्ष्मण को अपने यज्ञ की रक्षा के लिए मांग करने के बाद महाराज दशरथ विचलित हुए तो गुरु वशिष्ठ द्वारा समझाने के बाद दशरथ अपने दोनों पुत्रों राम-लक्ष्मण को विश्वामित्र को सौंप देते हैं । जाते समय रास्ते में ताड़का नामक निश्चचरी से भेंट होती है जिसे भगवान श्रीराम ने अपने एक ही बाण से बध कर देते हैं।

वही जंगल में मारीच और सुबाहु नामक दो निशाचरों से मुलाकात होती है जिसे श्री राम ने मारीच को बिना फर के बाण के द्वारा सौ योजन दूर पर भेज देते हैं वही सुबाहु का बध कर देते हैं। आगे बढ़ने पर घने जंगल में एक शीला देखकर श्री राम ने विश्वामित्र से शीला का राज जानना चाहा तो महर्षि विश्वामित्र ने बताया कि यह शीला महर्षि गौतम ऋषि की पत्नी अहिल्या है जो वर्षों से श्राप के कारण पत्थर बनी हुई है और आपके चरण रज की प्रतीक्षा कर रही हैं आप अपने चरणों से इस शीला को स्पर्श कर गौतम ऋषि की पत्नी का उद्धार करें ।

श्री राम ने चरण स्पर्श करते ही पत्थर की शिला अपने असली अहिल्या के में रूप में आ जाती है और भगवान श्री राम की पूजा अर्चना करने के बाद चली जाती है औऱ महर्षि विश्वासमित्र सहित श्रीराम और लक्ष्मण आगे की तरफ चल देते हैं । आगे श्रीराम के पूछने पर गंगा अवतरण की कथा महर्षि विश्वामित्र राम को बताते हैं और यही पर रामलीला को विराम दे दिया गया।

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