डुग्गी बजते ही जाग उठी आस्था, मां काली के दरबार में उमड़ा कनुवान


दैवीय आपदा से गांव की रक्षा और सुख-समृद्धि के लिए श्रद्धालुओं ने की पूजा-अर्चना, गाजे-बाजे के साथ निकली शोभायात्रा

 

संवाददाता – त्रिलोकी नाथ राय 

 

भांवरकोल/गाजीपुर। क्षेत्र के कनुवान गांव में सैकड़ों वर्षों से चली आ रही मां काली की वार्षिक सावनी पूजा सोमवार को हल्की बारिश के बीच विधि-विधान और श्रद्धाभाव के साथ संपन्न हुई। पूजा में गांव के सभी वर्गों के लोगों ने बढ़-चढ़कर भाग लिया। श्रद्धालुओं ने मां काली से गांव की सुख-शांति, समृद्धि और दैवीय आपदाओं से रक्षा की कामना की।

 

ग्रामीणों की मान्यता है कि दैवीय आपदा, महामारी और अन्य विपत्तियों से गांव की रक्षा के लिए मां काली के साथ डीह बाबा एवं माता सायर की पूजा-अर्चना की जाती है। पूजा को लेकर सुबह से ही गांव में उत्साह और भक्तिमय माहौल रहा। सुबह से दोपहर तक मां काली मंदिर में श्रद्धालुओं की भीड़ लगी रही। मंदिर परिसर में मां काली को दूध का कराहा भी चढ़ाया गया।

 

कनुवान गांव में मां काली की पूजा की शुरुआत भी अपनी अनूठी परंपरा के साथ होती है। पूजा शुरू होने से पहले गांव में डुग्गी बजाकर ग्रामीणों को इसकी सूचना दी जाती है। डुग्गी बजते ही लोग पूजा की तैयारियों में जुट जाते हैं और इसी के साथ मां काली की वार्षिक पूजा का शुभारंभ होता है। यह परंपरा आज भी ग्रामीणों ने पूरी श्रद्धा के साथ संजोकर रखी है।

 

सुबह से ही महिलाएं स्वच्छ वस्त्र धारण कर हाथों में कलश, छाक और गंगाजल लेकर मां काली मंदिर पहुंचीं। भक्ति गीतों के बीच महिलाओं ने माता का आह्वान किया। घरों में तड़के ही मां काली को पूड़ी और गुलवरा का भोग लगाकर पूजा-अर्चना की गई। इसके बाद देवी मंदिरों में विधि-विधान से धार चढ़ाई गई।

 

सामूहिक पूजन के दौरान मां काली को नारियल, खप्पर और चुनरी अर्पित की गई। पंडितों ने मंत्रोच्चार के साथ हवन-पूजन कराया। पूजा के दौरान मां काली के पुजारी (पंथी) ने श्रद्धालुओं के साथ गाजे-बाजे के बीच मां काली की परिक्रमा की। इसके बाद पूरे परिसर में जुलूस निकाला गया। श्रद्धालु लगातार मां काली के जयकारे लगाते रहे, जिससे पूरा वातावरण भक्तिमय हो उठा। आरती के बाद श्रद्धालुओं में प्रसाद वितरित किया गया।

 

ग्रामीणों के अनुसार मां काली की पूजा का उद्देश्य ग्रामवासियों एवं क्षेत्रवासियों की सुरक्षा, सुख-शांति और समृद्धि के लिए देवी से प्रार्थना करना है। मान्यता है कि पूजा से गांव को बाहरी आपदा एवं बीमारियों के प्रकोप से रक्षा मिलती है और पशु-पक्षियों की भी सुरक्षा होती है।

 

शाम को कनुवान गांव के ब्राह्मणों को सामूहिक भोज कराने की वर्षों पुरानी परंपरा भी निभाई गई। ग्रामीणों ने बताया कि यह आयोजन केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि गांव की एकता, सामाजिक समरसता और आपसी भाईचारे का भी प्रतीक है। बदलते समय के बावजूद ग्रामीण इस प्राचीन परंपरा को पूरी श्रद्धा और उत्साह के साथ आगे बढ़ा रहे हैं।

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