संवाददाता – त्रिलोकी नाथ राय
भांवरकोल/गाजीपुर। गुरु पूर्णिमा के पावन अवसर पर आयोजित आध्यात्मिक प्रवचन में आचार्य पंडित जीतन मिश्र ने गुरु-शिष्य परंपरा की महिमा का विस्तार से वर्णन करते हुए कहा कि सद्गुरु अपने शिष्य पर स्मरण, दृष्टिपात, ज्ञान और स्पर्श—इन चार माध्यमों से कृपा बरसाते हैं। गुरु की कृपा से ही शिष्य का आध्यात्मिक, बौद्धिक और नैतिक विकास संभव होता है।
उन्होंने कहा कि जिस प्रकार कछुआ रेत में अंडे देकर स्वयं जल में रहता है, किंतु निरंतर स्मरण के प्रभाव से अंडों का पोषण होता रहता है, उसी प्रकार गुरु से दूर रहकर भी जो शिष्य उनकी आज्ञा का पालन करता है तथा अपने विचार, व्यवहार और चरित्र से गुरु के नाम, गुण और यश का विस्तार करता है, ऐसे शिष्य का गुरु केवल स्मरण मात्र से ही उसका कल्याण कर देता है।
आचार्य मिश्र ने कहा कि जैसे मछली अपनी कृपा-दृष्टि से अंडों को परिपक्व कर देती है, उसी प्रकार गुरु की एक करुणामयी दृष्टि शिष्य के जीवन का आध्यात्मिक कायाकल्प कर देती है। सद्गुरु की कृपा-दृष्टि शिष्य के भीतर सुप्त आध्यात्मिक चेतना को जागृत कर देती है।
उन्होंने आगे कहा कि जिस प्रकार कुररी पक्षी आकाश में रहकर अपनी ध्वनि के माध्यम से अंडों का संरक्षण करती है, उसी प्रकार गुरु अपने उपदेश, प्रवचन, आदेश और दिव्य वाणी से शिष्य को योग्य, विवेकशील और संस्कारित बनाते हैं। सद्गुरु का स्पर्श भी शिष्य के जीवन में नई चेतना और आत्मबल का संचार करता है।
आचार्य मिश्र ने कहा कि भारतीय संस्कृति में गुरु को भगवान से भी श्रेष्ठ स्थान इसलिए प्राप्त है, क्योंकि गुरु ही ईश्वर की पहचान कराते हैं और उनके साक्षात्कार का मार्ग प्रशस्त करते हैं। साधक के लिए सिद्धि से अधिक महत्वपूर्ण साधन होता है और परमात्मा रूपी सिद्धि की प्राप्ति का सर्वोत्तम साधन सद्गुरु ही हैं।
उन्होंने कहा कि गुरु के प्रति अटूट निष्ठा, श्रद्धा और विश्वास ही अंततः साधना का फल बन जाते हैं। एकलव्य इसकी अमिट मिसाल हैं। इसी प्रकार शबरी ने भी अपने गुरु के वचनों पर अडिग विश्वास रखा। वह स्वयं भगवान श्रीराम के पास नहीं गईं, बल्कि उनकी गुरु-निष्ठा से प्रसन्न होकर स्वयं प्रभु श्रीराम उनके आश्रम पहुंचे।
आचार्य मिश्र ने कहा कि भगवान श्रीराम के जीवन में महर्षि वशिष्ठ ने गुरु के रूप में मार्गदर्शन दिया, जबकि महर्षि विश्वामित्र ने उन्हें दिव्य ज्ञान, शौर्य और धर्म के उच्च आदर्शों से परिचित कराया। अंत में उन्होंने कहा कि गुरु जीवन को दिशा देते हैं, जबकि सद्गुरु जीवन को दिव्यता प्रदान करते हैं। गुरु बहुत कुछ देते हैं, किंतु सद्गुरु अपना सर्वस्व देकर शिष्य के जीवन को धन्य बना देते हैं।
