जमानिया (गाजीपुर): नगर पालिका परिषद जमानिया में एक गंभीर मामला सामने आया है, जिसने प्रशासनिक कार्यप्रणाली और जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही पर बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया है। वार्ड संख्या-19 से निर्वाचित सदस्य अंजीनी कुमार गुप्ता ने आरोप लगाया है कि नगर पालिका अध्यक्ष की मनमानी, भ्रष्टाचार और राजनीतिक द्वेषपूर्ण रवैये के कारण उनका परिवार बर्बादी के कगार पर पहुंच गया।
अंजीनी गुप्ता के अनुसार, उन्होंने अपनी पत्नी उषा गुप्ता के नाम वर्ष 2024 में भूमि का विधिवत रजिस्ट्री बैनामा कराया और नियमानुसार 2% शुल्क भी नगर पालिका को जमा किया। इसके बावजूद नामांतरण की प्रक्रिया को जानबूझकर लटकाया गया। आरोप है कि अध्यक्ष ने अपने पद का दुरुपयोग करते हुए तय समयसीमा के बाद आपत्तियां मंगाकर प्रक्रिया को बाधित किया।
इस प्रशासनिक लापरवाही और मानसिक तनाव के चलते उनकी पत्नी की हृदय गति रुकने से मृत्यु हो गई। इसके बाद भी जब उनके पुत्र द्वारा शपथ पत्र सहित नामांतरण के लिए आवेदन किया गया, तब भी कोई सुनवाई नहीं हुई।
पीड़ित परिवार का कहना है कि उन्होंने जिलाधिकारी और उपजिलाधिकारी कार्यालयों के चक्कर काट-काटकर सैकड़ों आवेदन दिए, लेकिन कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। इससे यह सवाल उठता है कि क्या प्रशासनिक तंत्र पूरी तरह से एक व्यक्ति के दबाव में काम कर रहा है?
स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि अंजीनी गुप्ता ने आत्महत्या तक की चेतावनी दे डाली है। यह घटना न सिर्फ प्रशासनिक विफलता को दर्शाती है, बल्कि यह भी बताती है कि जब जनप्रतिनिधि ही न्याय के लिए भटकने को मजबूर हों, तो आम जनता का क्या हाल होगा।
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लोक अधिकार समाचार के संवाददाता गौरव चौबे “गोबिंद” से बातचीत के अंश:
संवाददाता: “आप इतने बड़े कदम के बारे में क्यों सोच रहे हैं?”
अंजीनी गुप्ता: “जब कोई व्यक्ति हर दरवाजा खटखटा लिया, लेकिन कहीं से न्याय नहीं मिला, तो वह टूट जाता है। मेरी पत्नी की मौत का जिम्मेदार कौन है? क्या सिर्फ इसलिए कि मैंने भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाई?”
संवाददाता: “क्या आपको प्रशासन से कोई उम्मीद नहीं बची?”
अंजीनी गुप्ता: “उम्मीद तो थी, लेकिन अब लगता है कि सब कुछ सत्ता के दबाव में है। अधिकारी भी नपा अध्यक्ष के सामने बेबस नजर आते हैं।”
संवाददाता: “आप जनता से क्या कहना चाहेंगे?”
अंजीनी गुप्ता: “अगर आज मेरी आवाज दबाई जा रही है, तो कल किसी और की बारी होगी। यह सिर्फ मेरी लड़ाई नहीं, बल्कि पूरे समाज के अधिकारों की लड़ाई है।”
यह मामला केवल एक व्यक्ति या परिवार की त्रासदी नहीं है, बल्कि यह लोकतांत्रिक व्यवस्था की जड़ों में लग रही दीमक का संकेत है। यदि समय रहते निष्पक्ष जांच और कार्रवाई नहीं हुई, तो जनता का भरोसा व्यवस्था से पूरी तरह उठ सकता है।
