संत सद्ग्रंथ और भगवंत का सानिध्य जीवन में परम आवश्यक है-फलाहारी बाबा


बाराचंवर । मानस मर्मज्ञ भागवत वेत्ता श्री श्री 1008 श्री शिवराम दास जी फलाहारी बाबा ने अपने मुखारविंद से ज्ञान भक्ति और वैराग्य की कथा मृत की वर्षा करते हुए कहा की

समस्त पाप का बाप लोभ है। मछली आटे के लोभ में गला फसा लेती है भंवरा सुगंध के लोभ में कमल के फूल में बंद हो जाता है राग रागिनी के प्रलोभन से हिरण बंधन में पड़ जाता है प्रकाश के लोभ में पतंग जीवन खो देता है दाना के लोभ में पंछी जाल में फंस जाता है। हम सब लोभ के चंगुल में फंसे हुए हैं। संतोष के द्वारा ही लोभ से बचा जा सकता है। लोभ से बड़ा इस जगत में कोई रोग नहीं है क्रोध से बड़ा कोई दुश्मन नहीं है दरिद्रता से बड़ा कोई दुख नहीं है। श्रीमद् भागवत में भक्ति महारानी देवर्षि नारद से कहती है कि साधु का दर्शन पाप का हरण करता है।संत सद्ग्रंथ और भगवंत का सानिध्य जीवन में परम आवश्यक आवश्यकता है। लंका में जब तक विभीषण रहा तब तक रावण का बाल बांका नहीं हुआ। हस्तिनापुर से विदुर के चले जाने पर कौरवों की दुर्दशा हो गई। गुरु अर्थ गुरु तत्व भारत चिंतन वल्लरी का वह पुष्प है जिसके सौरभ के बिना प्राणी मात्र भी यदि अग्रसारित होने की इच्छा रखता है तो केवल दम्भ मात्र ही सिद्ध होकर रह जाता है गुरु का कार्य अपने शिष्य के अंदर के अहंकार ममकार को तिरस्कृत एवं परिष्कृत करते हुए जीवात्मा और परमात्मा से संबंध स्थापित करा देना है संबंध तो स्थापित है ही जो ग्यापित करा दे उसका नाम सद्गुरु है। गृहस्ती दांपत्य को सुपुत्र पैदा करना हो तो कर्दम ऋषि और देवहुती के दांपत्य को पढ़ना और सुनना चाहिए। सत्संग और कथा से दांपत्य सुंदर और सुचारू रूप से संचालित होता है। सुख जगत में नहीं जगदीश में है। रावण के घर वेद का पाठ करने के लिए ब्रह्मा जी आया करते थे झाड़ू लगाने लक्ष्मी जल भरने इंद्र आता था तीनों त्रिलोक 14 भुवन का मालिक रावण था। फिर भी शिव स्तुति के अंत में कहता था ।कदा सुखी भवाम्यहम्। हे भोलेनाथ मैं सुखी कब होउंगा। सुख संग्रह में नहीं संतोष में छुपा होता है।

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