पडरौना (कुशीनगर) के लाल चर्चित किसान नेता व पूर्व मंत्री राधेश्याम सिंह का संघर्ष मय जीवन


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कुशीनगर । दोस्तो आज जिस शख्स को पडरौना का लाल कहा जाता है उनका किस्सा भी है और कहानियां भी। एक जमाना था पूर्वांचल के किसानों पर जो जुल्म करने की कोशिश करता था उसके चेहरे पर भय साफ देखा जाता था। चाहे कोई पुलिसवाला हो या चीनी मिलों के अधिकारियों या प्रशासनिक अधिकारी ही क्यो न हो, उसके और किसानों के बीच मे कोई मजबूती से खड़ा होने की हिम्मत रखता था वो थे किसान नेता राधेश्याम सिंह। दोस्तो एक तरफ 80 का दशक ढल रहा था दूसरी तरफ 90 का दशक आने के कगार पर था। उसी समय गन्ना किसानों को गुलामी की दास्तां से मुक्त करवाने के लिए तीन नवजवान संघर्ष के दम पर उदय ले रहे थे। जाने अनजाने में शुरू की एक छोटी सी पारी कब विशाल बन गई ये सब कुछ एक सपने के साकार होने की तरह था। लक्ष्मीगजन केन यूनियन पर तीन नवजवान राधेश्याम सिंह,शंभु सिंह,भूषण पांडेय किसानों की लड़ाई लड़ने के लिए कहकरा सिख रहे थे। देश भले ही आजाद हो गया था पर 40 साल पहले किसान आजाद नही थे। अपने खून पसीने से तैयार किया गया फसल खासकर गन्ने की फसल किसानों के लिए बड़ी समस्या थी और गन्ने के अलावा कोई अन्य विकल्प नही था। गन्ना ही नही अन्य फसले भी किसानों के लिए समस्या बन जाती थी। किसानों को सरकारी मोहकमा, चीनी मिलों के अधिकारी व कर्मचारी शोषण का सबसे बड़ा साधन समझते थे। किसानों की हालत ये थी उसको पुलिस थानों तक जाने में किसी बिचौलियों का सहारा लेना पड़ता था। थानों के लिए दलाली चरम पर था। गन्ना किसान किसान न होकर अक्षुत होते थे। चीनी मिलों को उधार पर गन्ना देने वालो को चीनी मिल के कुर्सियों पर बैठने की इजाजत नही थी। कहते है जब जुर्म हद से बढ़ जाये तो इंसान को बगावत का रुख अख्तियार कर लेना चाहिये। 90 के दशक की शुरुआत में इस नवजवान की हनक सुनाई देने लगी थी। गन्ना मूल्य भुगतान की मांग वाला धरना लक्ष्मीगंज से रामकोला तक फैल गया और किसानों का समर्थन मिलने लगा। उस समय गन्ना किसानों की हालत बंधुआ मजदूरों जैसी थी,गन्ना किसान चीनी मिलों और साहूकारों का गुलाम था। हजारों रुपये का गन्ना चीनी को देने वाला किसान जिस दिन गन्ने का भुगतान होता उस दिन मात्र एक झोला सब्जी लेकर घर जाता था,गन्ने का रुपया साहूकारों के सूद का भेंट चढ़ जाता था। राधेश्याम सिंह का आंदोलन जोड़ पकड़ रही थी,रेल रोकना रास्ता जाम प्रशासन के लिए चुनौती बन रहा था। धरने पर अधिकारी आते थे झूठ बोलकर धरना समाप्त करवा कर निकल लेते थे समस्या वही का वही था। जुर्म नही रुका तो आया वो बगावत का दौर 9 सितंबर 1992 का वो दिन जब एक पखवारे से चल रहे 14 करोड़ गन्ना मूल्य बकाये को लेकर आंदोलन इतिहास बन गया। आंदोलन कारीयो ने चीनी मिल के तीन अधिकारियो को धरना स्थल पर वन्धक बना लिया। और उसी दिन रात में पुलिस ने सख्त रुख अखितयार किया और लाठीचार्ज कर वन्दी बनाये गए चीनी मिल के अधिकारियों को मुक्त तो करवा लिया। पर आंदोलन की धार से उसी दिन गन्ना किसान भी गुलामी से मुक्त हो गया। उसी दिन रात को रामकोला थाने में जो दृश्य था वो हाड़ कपा देने वाली था। थाने के भीतर राधेश्याम सिंह और उनके साथियों को पुलिस प्रशासन जान से मारने की पूरी तैयारी में थे तो थाने के बाहर हजारों की संख्या में किसान अपने नेताओं को बचाने के लिए अपनी जान देने को तैयार थे। किसानों का गुस्सा देख प्रशासन को अपनी सुरक्षा के लिये राधेश्याम सिंह और उनके साथी शंभु सिंह,और भूषण सिंह को देवरिया जेल में ट्रांसफर करना पड़ा। जान तो बच गई पूरा शरीर लाठियों के प्रहार से लहूलुहान था। जिस राधेश्याम सिंह को उनके विरोधी हल्के में लेते थे। उस राधेश्याम सिंह के हनक की गूँज सत्ता के गलियारों में सुनाई देने लगी, तत्कालीन मुख्यमंत्री स्व कल्याण सिंह की सरकार सकते में आ गई थी तो देश के तत्कालीन कांग्रेस के राष्टीय अध्यक्ष/प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव ने अपने नेताओं को रामकोला के लिए कूच करवा दिया था। खैर उस आंदोलन के बारे में लिखा जाय तो किताब भी कम पड़ जाय। 1996 के विधानसभा चुनाव में मतदाताओ ने रिकॉर्ड बनाकर अपने प्रिय नेता को उत्तर प्रदेश के विधानसभा में भेज तो दिया पर इस नेता का मन लखनऊ में कहा लगने वाला था उसको अभी गन्ना किसानों को गुलामी से पूरी तरह मुक्त करवाना था। विधायक बनने के बाद गन्ने के रेट दो रुपये अंतर को लेकर यह सख्स 78 दिन तक चीनी मिल पर धरने पर बैठ गया,उसी बीच दो बार जेल भी जाना पड़ा। प्रशासन ने सोचा राधेश्याम सिंह और उनके साथियों को जेल भेजवाकर आंदोलन खत्म करवा देंगे पर हो गया उल्टा धरने की कमान किसानों ने थाम लिया। किसानों ने धरने की कमान ही नही संभाली बल्कि प्रशासन को अपने नेता को जेल से बाहर निकलवाने पर मजबूर कर दिया था। नेता लोग जन संघर्ष करते है विधायक और सांसद बनने के लिए लेकिन ये व्यक्ति किसी और मिट्टी का बना हुआ था,विधायक पद भी किसानो के लिये संघर्ष के रास्ते से विचलित नही कर पाई। 1996 से 2003 के बीच सरकार भजापा/ बसपा की रही लेकिन सिक्का राधेश्याम सिंह का चलता था।2003 में प्रदेश में सपा की सरकार बनी हाटा में नई चीनी मिल बन गया। देवराड़ा पिपरा, सोहसा के छोटी गंडक पर दो पूल बन गये दोनों पुल वहां के आस पास के सैकड़ो गांवों की आज भी लाइफ लाइन बन हुआ है। आज गन्ना मूल्य भुगतान समय से हो रहा है वो 1992 के किसान आंदोलन की देन है। किसानों के साथ चीनी मिलों,गन्ना समितियों, खुले बाजारों में किसानों को इज्जत मिल रहा है वो राधेश्याम सिंह का देन है। गन्ना किसानों के लिए इस शख्स ने बहुत कुछ त्याग किया 1996-97 में मिलने वाले मंत्री पद ऐसे ठुकरा दिया जैसे कोई सूखा पत्ता हो। 1996 में निर्दल की हैशियत से चुनाव जीतने वाले राधेश्याम सिंह बाद में सपा ज्वाइन कर लिए जहा अभी तक डटे हुए है। 2007 में जब प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी की सरकार आई तो सपा के बड़े बड़े नेता या तो दिल्ली निकल लिये या भूमिगत हो गये। परन्तु ये नेता अपने आदोंलन की धार को कम नही होने दिया। हालांकि 2007 के चुनाव में विधान सभा मे हार मिली पर उस हार ने भी जनसंघर्ष से विचलित नही होने दिया। सरकारें किसी की हो पूर्वांचल में अब भी सिक्का राधेश्याम सिंह का ही चलता है। ये जो कुछ लिखा गया है वो राधेश्याम सिंह के 1988 से लेकर अबतक के जीवन का एक अंश भी नही है,मैंने शुरू में लिखा हू कि राधेश्याम सिंह के कहानियां और किस्से है, ये दोनों इतने आसानी से बया नही किये जा सकते कइयों दिन लग जाएंगे लिखने और पढ़ने मे। मैं उस चीज के बारे में लिखने की कोशिश किया हू जो पूर्व मंत्री राधेश्याम सिंह को पहले किसान नेता बनाया उसके बाद जननायक बनाया। जननायकों के लिए पद मायने नही रखता उसके पीछे खड़ी भीड़ ही उसकी पहचान होती है। एक घटना का जिक्र कर अपना यह लेख बन्द करता हू। एक बार लोक सभा चुनाव के मतदान के दिन एक ग्राम प्रधान अपने ही गाँव के बूथ पर एक प्रत्याशी का एजेंट बने थे और उसी बूथ पर विवाद हो गया मार पीट हो गई।पुलिस आई और प्रधान जी को पकड़ कर कोतवाली लाई,प्रधान जी के लोग अपने नेता/ प्रत्याशी के पास मदद के लिये गये उस प्रत्याशी ने टका से जबाब दे दिया। हार थक कर प्रधान जी के लोग निराश भाव लिए राधेश्याम सिंह के पास गए और मदद की गुहार लगाई। राधेश्याम सिंह ने बिना किसी लांग लपेट के दलीय भावना से ऊपर उठकर कोतवाल के पास फोन किया प्रधान को छोड़ दो,कोतवाल ने कहा यह मुमकिन नही है,राधेश्याम सिंह ने कहा बस मैं आधी घण्टे में कोतवाली पहुँच रहा हूं। फिर क्या कोतवाल अपने सरकारी गाड़ी में इज्जत के साथ प्रधान को उनको उनके घर तक पहुँचाकर आये। ये भी एक छोटा सा अंस है किस्से और कहानियां राधेश्याम सिंह के अनेक है जो किसानो को,नवजवानों को पढ़ना और सुनना चाहिए। सही मायने में पडरौना(कुशीनगर) का यह लाल पूर्वांचल के लिए कोहिनूर है। पूर्व विधायक राधेश्याम सिंह, पूर्व विधायक स्व सुरेंद्र शुक्ला व पूर्व सांसद बालेश्वर यादव ये नेता गण जनता के लिये संघर्ष कर राजनीति मे अपना प्रभुत्व कायम किये।न कि विमार जनता व मृत्य इंसान को कंधा देते हुए सेल्फी लेकर सोशल मीडिया पर शेयर कर राजनितिक स्थान बनाये है।तब के व अबके नेताओं मे अंतर साफ दिख रहा है।अब तो राजनीति व्यवसाय का केंद्र बन चुकी है।

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