रिपोर्ट: आबिद शमीम
नंदगंज (गाज़ीपुर)। जहाँ एक ओर पूरी दुनिया में 1 मई को मज़दूर दिवस के रूप में श्रमिकों के सम्मान और उनके अधिकारों की बात की जाती है, वहीं गाज़ीपुर के नंदगंज इलाके में इस दिन की हकीकत कुछ और ही कहानी बयां करती दिखी। यहाँ मज़दूर दिवस पर भी मजदूर अपनी रोज़मर्रा की जद्दोजहद में उलझे रहे—सिर्फ दो वक्त की रोटी के लिए।
इस खास दिन पर, जब मजदूरों को अपने परिवार के साथ समय बिताना चाहिए था, अपने अधिकारों और सम्मान का एहसास करना चाहिए था, तब भी वे काम पर जाने को मजबूर दिखे। कई मजदूरों ने बताया कि अगर वे एक दिन भी काम नहीं करेंगे, तो उनके बच्चों के लिए भोजन जुटाना मुश्किल हो जाएगा।
सबसे दर्दनाक पहलू यह रहा कि मजदूर अपने बच्चों के साथ एक पल भी नहीं बिता पाए। उनके नन्हे बच्चे, जो शायद इस दिन अपने माता-पिता के साथ समय बिताने की उम्मीद कर रहे थे, वे भी इस सच्चाई से रूबरू हो गए कि उनके माता-पिता की जिंदगी में “मज़दूर दिवस” जैसा कोई अवकाश नहीं होता।
एक मजदूर की आंखों में झलकती पीड़ा ने बहुत कुछ कह दिया—”हमारे लिए हर दिन एक जैसा है, साहब। मज़दूर दिवस हो या कोई और दिन, पेट की आग हमें काम पर खींच ही लाती है।”
ऐसे में सवाल उठता है कि जब मज़दूर अपने ही दिवस पर सम्मान और विश्राम से वंचित रह जाएं, तो इस दिन का महत्व आखिर क्या रह जाता है?
मज़दूर दिवस की सच्चाई यही है—यह सिर्फ कैलेंडर पर दर्ज एक तारीख बनकर रह गया है, जबकि असल जिंदगी में मजदूर आज भी अपनी बुनियादी जरूरतों के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
