धर्मेंद्र भारद्वाज। मऊ
हाल के दिनों में फिल्मों एवं वेब सीरीज में जातिसूचक शब्दों और आपत्तिजनक संवादों के प्रयोग को लेकर सामाजिक संगठनों में रोष व्याप्त है। विभिन्न प्रतिनिधियों ने आरोप लगाया है कि कुछ फिल्म निर्माता सस्ती लोकप्रियता हासिल करने के उद्देश्य से विशेष जाति एवं समाज को सामूहिक रूप से अपराधी या नकारात्मक छवि में प्रस्तुत कर रहे हैं, जिससे सामाजिक सौहार्द को ठेस पहुँच रही है।
प्रतिनिधियों का कहना है कि “घूसखोर पंडित” जैसे शब्द न केवल दुर्भाग्यपूर्ण हैं, बल्कि समाज में विभाजन की भावना को भी बढ़ावा देते हैं। उनका तर्क है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर किसी भी जाति या समुदाय को सामूहिक रूप से बदनाम करना संविधान की भावना के विपरीत है।
स्मरण कराया गया कि ब्राह्मण समाज सहित अनेक वर्गों का राष्ट्र निर्माण में ऐतिहासिक योगदान रहा है। स्वतंत्रता संग्राम में मंगल पांडे, चंद्रशेखर आज़ाद जैसे क्रांतिकारियों की भूमिका, शिक्षा क्षेत्र में पंडित मदन मोहन मालवीय का योगदान तथा सामाजिक परिवर्तन में विभिन्न वर्गों के सहयोग को रेखांकित करते हुए वक्ताओं ने कहा कि इतिहास को नकारात्मक प्रस्तुति से धूमिल नहीं किया जाना चाहिए।
संगठनों ने केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC) से मांग की है कि फिल्मों एवं वेब सीरीज की सामग्री का गंभीरतापूर्वक परीक्षण किया जाए। यदि किसी भी माध्यम में जातिसूचक अथवा अपमानजनक शब्दों का प्रयोग पाया जाए तो संबंधित निर्माताओं एवं जिम्मेदार व्यक्तियों के विरुद्ध कठोर कानूनी कार्रवाई की जाए।
प्रमुख मांगें इस प्रकार हैं:
आपत्तिजनक सामग्री प्रस्तुत करने वाले निर्माता, निर्देशक एवं संबंधित टीम के विरुद्ध दंडात्मक कार्रवाई।
ब्राह्मण समाज की सुरक्षा हेतु विशेष कानून (ब्राह्मण एट्रोसिटी एक्ट) लागू करने पर विचार।
सवर्ण आयोग के गठन की मांग।
प्रतिनिधियों ने सरकार से आग्रह किया है कि संबंधित अधिकारियों एवं सेंसर बोर्ड को निर्देशित कर ऐसी फिल्मों व डिजिटल कंटेंट पर तत्काल प्रभाव से प्रतिबंध लगाया जाए, ताकि किसी भी समाज, विशेषकर बुद्धिजीवी वर्ग की गरिमा सुरक्षित रह सके।
इस मुद्दे को लेकर सामाजिक एवं राजनीतिक हलकों में बहस तेज हो गई है। अब देखना यह है कि सरकार और संबंधित संस्थाएं इस पर क्या कदम उठाती हैं।
