आजादी यूँ ही नहीं मिली: शहीदों की कुर्बानी और गांधी की प्रासंगिकता


धर्मेंद्र भारद्वाज। मऊ

नई पीढ़ी को स्वतंत्रता संग्राम के त्याग और मूल्यों की याद दिलाने की आवश्यकत

 

“ऐ मेरे वतन के लोगों, ज़रा आँख में भर लो पानी…”

लता मंगेशकर द्वारा गाया गया यह गीत केवल शब्द नहीं, बल्कि उन असंख्य बलिदानों की जीवंत स्मृति है, जिनकी बदौलत आज हम स्वतंत्र भारत में साँस ले पा रहे हैं।

एक पुरानी कहावत है— “सावन के अंधे को हरा ही हरा दिखता है।”

आज के परिप्रेक्ष्य में यह कहावत अत्यंत प्रासंगिक प्रतीत होती है। आज की पीढ़ी को अक्सर यह भ्रम हो जाता है कि भारत स्वतः ही आज़ाद हो गया था, जबकि सच्चाई यह है कि इस आज़ादी की नींव असंख्य शहीदों के खून, त्याग और संघर्ष से रखी गई है।

देश के पूर्वजों ने मुगलों और अंग्रेजों के अत्याचार सहे, लाठियाँ खाईं, गोलियाँ झेलीं, फाँसी के फंदों पर हँसते-हँसते चढ़ गए। उन्होंने अपने आज के लिए नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के उज्ज्वल भविष्य के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया। भारत की आज़ादी सामूहिक संघर्ष, एकता और अदम्य साहस का परिणाम थी।

इस संघर्ष में अनगिनत वीरों ने योगदान दिया, किंतु महात्मा गांधी का मार्ग सबसे अलग और अद्भुत था। सत्य और अहिंसा के उनके सिद्धांतों ने पूरी दुनिया को प्रभावित किया। महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन ने गांधी जी के बारे में कहा था कि आने वाली पीढ़ियाँ शायद यह विश्वास ही न कर सकें कि हाड़-मांस का ऐसा व्यक्ति भी धरती पर कभी चला था।

गांधी जी से प्रेरणा लेकर मार्टिन लूथर किंग जूनियर, नेल्सन मंडेला, दलाई लामा, आंग सान सू की सहित अनेक वैश्विक नेताओं ने अन्याय के विरुद्ध अहिंसक संघर्ष किया और नोबेल पुरस्कार से सम्मानित हुए। यह गांधी विचारधारा की वैश्विक स्वीकार्यता का प्रमाण है।

हालाँकि यह विडंबना ही है कि जिस महात्मा को पूरी दुनिया जानती है, उसी को उनके अपने देश में धीरे-धीरे भुलाया जा रहा है। गांधी आज प्रासंगिक हैं या नहीं—इस पर बहस हो सकती है, लेकिन यह निर्विवाद सत्य है कि भारत की पहचान विश्व में गांधी के नाम से जुड़ी है।

आज आवश्यकता है कि वर्तमान और आने वाली पीढ़ियों को यह बताया जाए कि आज़ादी कितनी कठिन तपस्या के बाद मिली थी। भ्रष्टाचार, हिंसा, अनैतिकता और सामाजिक बुराइयों के दलदल में फँसकर हम अपने शहीदों के बलिदान को व्यर्थ नहीं कर सकते।

देश को बचाना, उसकी गरिमा बनाए रखना और उसके मूल्यों की रक्षा करना—यही सच्ची श्रद्धांजलि है उन अमर शहीदों को।

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