शेरपुर में पारंपरिक सुरवाली होली गायन की अलग विधा आज भी जीवित, प्राचीन सांस्कृतिक विरासत को सम्हाले ग्रामीण


संवाददाता – त्रिलोकी नाथ राय


भांवरकोल/ गाजीपुर । अक्सर होली गायन की शैली ग्रामीण क्षेत्रों में परंपरागत अलग अलग है। लेकिन क्षेत्र के शेरपुर कलां एवं खुर्द गांव में अति प्राचीन सुर वाली पारंपरिक होली गायन की अलग विधा आज भी जीवित है।

स्थाई मध्यम एवं तीव्र सुर पर बिना रुके निर्बाध रूप से गोल बनाकर दोनों तरफ से सात से आठ बार उच्च सुर में सुर लगाकर होली गीत की विधा शेरपुर गांव की प्राचीन होली की अलग पहचान बनाती है।

होलाष्टक से शुरू होकर होली तक रंग और भक्ति के संगम से सराबोर इस होली गायन कार्यक्रम में ग्रामीणों की उत्साहपूर्ण भागीदारी अगले भोर तक चैइता गाने से होती है। पूरी रात तक फगुआ के धार्मिक पारंपरिक गीतों की मधुर ध्वनि इस गांव में गूंजती रहती है।

 

अति प्राचीन होली गीत..

 

“होली खेलत अवध बिहारी तानुज नितंत….

एक ओर खेलते राम लखन,

 एक ओर सखियां समेत जानकी, 

राम के साथ कनक पिचकारी,सीता के साथ अबीर , 

होली बृज में हरि होरी मचाई,

 उतते निकली सखियां संग राधा , उतते कुंवर कन्हाई,

 खेले फाग परस्पर हिली मिली कुशल रहे दोउ जोड़ी”

 

उपरोक्त पंक्ति का भावार्थ बताते हुए गायकों ने कहा कि होली के इस दिव्य चित्रण में राम लक्ष्मण के हाथों में पिचकारी है, जबकि सीता के हाथ में अबीर से भरी झोली है। एक ओर कन्हैया तो दूसरी ओर राधा यह दृश्य प्रेम, आस्था और उल्लास का प्रतीक है। ग्रामीणों द्वारा सामूहिक रूप से भक्ति गीतों का बड़े ही भावपूर्ण प्रस्तुति से लोग होली के गीत में सारोबोर हो आनंन्दित होते हैं।

सुर वाली होली गायन की इस पुरानी परंपरा को यह गांव आज भी जीवित रखे हुए है । इस सम्बन्ध में शेरपुर खुर्द गांव के अति बुजुर्ग होली गायक बैजनाथ राय उर्फ बैजू काका ने बताया कि यहां गाई जाने सुर वाली होली गायन की विधा की देश में अलग पहचान बनाती है। इस गायन की अलग विधा गांव की अलग पहचान एवं सामाजिक सौहार्द को नई सांस्कृतिक परम्परा को नई ऊर्जा प्रदान करता है।

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