लोक अधिकार समाचार के संवाददाता सारंग राय से गाजीपुर में हुई साक्षात्कार के अंश
साक्षात्कारकर्ता: सर, आपके करियर की शुरुआत टूटी हुई हॉकी स्टिक और सीमित संसाधनों से हुई थी। आज के आधुनिक दौर में, जहाँ टर्फ मैदान और महंगे उपकरण आम हैं, आप उस पुराने दौर से आज के बदलाव को कैसे देखते हैं?
धनराज पिल्लै: देखिए, दौर पूरी तरह बदल चुका है। आज बच्चे जिस ग्रेफाइट स्टिक से खेल रहे हैं, वो लकड़ी की हॉकी जैसी नहीं रही। एक अच्छी हॉकी स्टिक की कीमत आज 10 हजार रुपये तक है, और शुरुआत करने के लिए भी कम से कम 5 हजार की स्टिक चाहिए होती है। हमारे समय में लकड़ी की हॉकी होती थी, जो दो हिस्सों में आती थी। अक्सर जब ब्लेड टूट जाता था, तो हम किसी पुरानी स्टिक का ब्लेड जोड़कर, उसे बांधकर खेलते थे। संसाधन कम थे, लेकिन हम इसलिए खेलते थे क्योंकि हमारे अंदर जुनून और लगन थी। पुणे के खड़की में, जहाँ मैं पला-ब बढ़ा, वहाँ का माहौल ही ऐसा था—वहाँ सिर्फ और सिर्फ हॉकी ही जीवन था।
साक्षात्कारकर्ता: आपकी बायोग्राफी फॉरगिव मि अम्मा काफी चर्चित रही है। खड़की की गलियों से लेकर अंतरराष्ट्रीय मंच तक के इस सफर में आपकी माता जी और परिवार का क्या योगदान रहा?
धनराज पिल्लै: आज मैं जहाँ भी खड़ा हूँ, उसका पूरा श्रेय मेरी माँ को जाता है। बेशक, मेरे भाइयों और दोस्तों का भी इसमें बड़ा हाथ रहा है। मैं यह नहीं कहूँगा कि मैंने अकेले सब कुछ किया; मेरे साथियों (टीममेट्स) का योगदान भी उतना ही महत्वपूर्ण है। जैसे अंबुज, जो सालों तक मेरे साथ इंडिया कैंप में रहे। हॉकी एक टीम गेम है, और जब आप तालमेल के साथ चलते हैं, तो न केवल आप देश का प्रतिनिधित्व करते हैं, बल्कि एक बेहतर नागरिक भी बनते हैं।
साक्षात्कारकर्ता: आपको आपकी रफ़्तार के लिए ‘तूफान’ कहा जाता था। क्या यह रफ़्तार नेचुरल थी या इसके पीछे कोई विशेष प्रशिक्षण था?
धनराज पिल्लै: यह काफी हद तक नेचुरल था। मेरे पिता और सभी भाई स्प्रिन्टर (धावक) थे। घर का माहौल ऐसा था कि हर भाई फॉरवर्ड लाइन में ही खेलता था। मेरे बड़े भाई रमेश पिल्लै जी देश के लिए खेले थे, उन्हें देखकर मुझे प्रेरणा मिली कि अगर मैं भी कड़ी मेहनत करूँ, तो मैं भी उस स्तर तक पहुँच सकता हूँ। बस इसी सोच के साथ खेलता गया और कब 15 साल बीत गए, पता ही नहीं चला।
साक्षात्कारकर्ता: आर्थिक रूप से परिवार बहुत मजबूत नहीं था, इसके बावजूद आपने हॉकी को ही करियर के रूप में क्यों चुना?
धनराज पिल्लै: जब मेरे बड़े भाई रमेश और गणेश की नौकरी लगी, तो घर की स्थिति थोड़ी सुधरी। लेकिन सरकारी तनख्वाह में माता-पिता, चार भाई, एक बहन और दादा-दादी का पूरा परिवार चलाना पिताजी के लिए कठिन था। मेरी माँ ने घर को संभाला। जब मेरी नौकरी लगी और मैं देश के लिए खेलने लगा, तब स्थिति बेहतर हुई। 1992 के बाद जब मैंने विदेशी लीग्स खेलना शुरू किया, तब आर्थिक रूप से स्थिरता आई। उस समय हमें डेढ़-दो महीने के लिए 1 से 2 लाख रुपये मिलते थे, जो उस दौर में हमारे लिए बहुत बड़ी बात थी।
साक्षात्कारकर्ता: आप भारत के इकलौते खिलाड़ी हैं जिन्होंने 4 ओलंपिक और 4 विश्व कप खेले हैं। आज के दौर में भी आपकी फिटनेस और निरंतरता (Consistency) का राज क्या है?
धनराज पिल्लै: इसका सबसे बड़ा कारण अनुशासित जीवनशैली है। मुझे किसी भी प्रकार का नशा, चाहे वो शराब हो या सिगरेट, छूने की आदत नहीं रही। मेरे अंदर सिर्फ खेल का जुनून था। हम सुबह 4 घंटे और शाम को 4 बजे से अंधेरा होने तक अभ्यास करते थे। उस समय हमारे सीनियर्स हमें गाइड करते थे। सुबैया साहब, आशीष बलाल और मार्क पैटरसन जैसे दिग्गजों के साथ खेलने का मौका मिला। 50-50 लड़कों के कैंप में अपनी जगह बनाना आसान नहीं था, लेकिन जिसने मेहनत की, उसने अपना मुकाम हासिल किया।
साक्षात्कारकर्ता: आपकी छवि एक आक्रामक और बेबाक खिलाड़ी की रही है। क्या फेडरेशन या सिस्टम के खिलाफ बोलने का आपको कभी नुकसान उठाना पड़ा?
धनराज पिल्लै: जी, बहुत ज्यादा नुकसान हुआ। मैंने 4 ओलंपिक, 4 वर्ल्ड कप, 4 एशियन गेम्स और लगभग 400 मैच खेलकर 200 के करीब गोल किए हैं। इसके बावजूद, मुझसे कम अनुभव वाले खिलाड़ियों को पद्मश्री और अन्य सम्मान मिले, जबकि मेरे आंकड़े पद्म भूषण के हकदार थे। मैं हमेशा फेडरेशन से खिलाड़ियों के हक के लिए लड़ता रहा। कई बार मुझे बाहर करने की कोशिश की गई, लेकिन मेरा खेल इतना मजबूत था कि वे मुझे नजरअंदाज नहीं कर सके। जैसा कि कहा गया है— “ख़ुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले, ख़ुदा बंदे से ख़ुद पूछे, बता तेरी रज़ा क्या है।” मैंने अपनी किस्मत खुद लिखी। मैं चाहता तो और भी खेल सकता था, लेकिन जो मिला, मैं उसमें खुश हूँ।
साक्षात्कारकर्ता: आपकी बातों से लगता है कि आपको मलाल है कि सरकार या फेडरेशन ने आपके साथ उचित न्याय नहीं किया?
धनराज पिल्लै: अब उम्र के इस पड़ाव पर नाराजगी नहीं है, लेकिन यह मलाल जरूर रहता है कि सम्मान उसे मिलना चाहिए जो उसका असली हकदार (डिजर्विंग) हो। आज के दौर में सोशल मीडिया और दिखावा ज्यादा है। हमारे समय में यह सब नहीं था। मैं आज के युवाओं से यही कहता हूँ कि अगर आप सोशल मीडिया से दूर रहकर वही समय मैदान पर देंगे, तो आपकी खेल में मास्टरी हो जाएगी।
साक्षात्कारकर्ता: आपकी किताब का शीर्षक ‘Forgive Me Amma’ (मुझे माफ़ करना माँ) बहुत भावुक है। इसके पीछे की क्या कहानी है?
धनराज पिल्लै: यह सिडनी ओलंपिक (2000) की बात है। हमारी टीम बहुत मजबूत थी और हम पदक के बहुत करीब थे। पोलैंड के खिलाफ मैच में हमें जीतना था, लेकिन वह मैच 1-1 से ड्रॉ हो गया और हम सेमीफाइनल की दौड़ से बाहर हो गए। मैंने घर से वादा किया था कि यह मेरा आखिरी ओलंपिक होगा और मैं मेडल लेकर लौटूंगा। जब हम हार गए, तो मैंने माँ को फोन किया और रोते हुए कहा, “माँ, मुझे माफ़ कर देना, मैं मेडल नहीं ला पाया।” उस समय मेरे रूममेट हरिंदर ने फोन ठीक से नहीं काटा था और पत्रकार संदीप मिश्रा ने वह पूरी भावुक बातचीत सुन ली थी। उसी घटना पर उन्होंने यह शीर्षक दिया।
साक्षात्कारकर्ता: आखिरी सवाल, भारतीय हॉकी के भविष्य को आप कैसे देखते हैं?
धनराज पिल्लै: भारतीय हॉकी का भविष्य उज्ज्वल है। टीम ने बैक-टू-बैक ओलंपिक मेडल जीते हैं। बस मेरी यही सलाह है कि विवादों से दूर रहें। अभी मनप्रीत सिंह जैसे खिलाड़ी, जो पूरी तरह फिट हैं और अनुभवी हैं, उन्हें 2026 विश्व कप तक मौका मिलना चाहिए। रिकॉर्ड तो टूटने के लिए ही बनते हैं। जैसे सचिन के रिकॉर्ड विराट या रोहित तोड़ रहे हैं, वैसे ही हॉकी में भी नए कीर्तिमान स्थापित होने चाहिए। जब तक स्वस्थ प्रतिस्पर्धा रहेगी, देश का खेल आगे बढ़ता रहेगा।
