साइकिल से शुरू हुआ सफर, अब वैन से पहुंच रहे उत्पादमूंज की मउनी-डलिया और जेवर को मिला डिजिटल बाजार, 350 महिलाओं को मिला रोजगार


साइकिल से शुरू हुआ सफर, अब वैन से पहुंच रहे उत्पादमूंज की मउनी-डलिया और जेवर को मिला डिजिटल बाजार, 350 महिलाओं को मिला रोजगार

कुशीनगर से अनिल राय की रिपोर्ट

14 साल पहले पत्नी की मउनी से मिली कारोबार की राह, सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो ने बदली किस्मत

विशुनपुरा (कुशीनगर)। मेहनत, लगन और बाजार की जरूरत को समझने की क्षमता हो तो गांव का हुनर भी देशभर में अपनी पहचान बना सकता है। इसकी मिसाल विशुनपुरा ब्लॉक के माधोपुर गांव निवासी कमला यादव और उनकी पत्नी सरिता यादव हैं। कभी साइकिल से कपड़े बेचकर परिवार चलाने वाले कमला आज मूंज की मउनी-डलिया और सजावटी उत्पादों के कारोबार से करीब 350 महिलाओं को जोड़ चुके हैं। इस सफर में दंपती को अपने जेवर और खेत तक बेचने पड़े, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी।
करीब 14 साल पहले कमला एक गांव में कपड़ा बेचने गए थे। वहां एक महिला ने बेटी की शादी के लिए मउनी मांगी। घर लौटकर कमला ने पत्नी सरिता को यह बात बताई तो उन्होंने मायके से लाई अपनी मउनी दे दी। कमला जब मउनी लेकर महिला के पास पहुंचे तो उसने मुंहमांगी कीमत दे दी। यहीं से उन्हें इस पारंपरिक उत्पाद की मांग का अंदाजा हुआ। इसके बाद उन्होंने आसपास की महिलाओं को जोड़कर मउनी-डलिया बनवाना शुरू किया। पूंजी की जरूरत पड़ी तो दंपती ने अपने जेवर और खेत तक बेच दिए। साइकिल से शुरू हुआ कारोबार पहले बाइक, फिर टेंपो और अब वैन तक पहुंच गया है।

मउनी-डलिया से झुमके-पर्स तक का सफर

अब समूह की महिलाएं मउनी-डलिया के साथ शादी-विवाह और छठ पूजा के लिए सजावटी सामान भी बनाती हैं। पलंग गेट, झूमर, चांदनी गेट, दरवाजा गेट, फॉल पोज और क्रूस डिजाइन के उत्पादों के अलावा बच्चों के खिलौने, महिलाओं के कंगन, झुमके, पर्स, बास्केट और लॉन्ड्री बैग भी तैयार किए जाते हैं। बेटी की शादी में दिए जाने वाले कई पारंपरिक सामान भी इस समूह के उत्पादों में शामिल हैं।

46 सेकेंड के वीडियो ने पहुंचाया देशभर में

22 दिसंबर 2024 को सरिता ने मउनी-डलिया से सजे उत्पादों का 46 सेकेंड का वीडियो इंस्टाग्राम पर साझा किया। कमला ने अपने खास अंदाज में उसका प्रचार किया तो वीडियो वायरल हो गया। इसे 85 लाख से अधिक व्यूज मिले। इसके बाद दिल्ली, कोलकाता, राजस्थान और महाराष्ट्र समेत कई राज्यों से ऑर्डर आने लगे। ग्राहक वीडियो कॉल पर उत्पाद देखकर सामान मंगाने लगे। दूर-दराज के ग्राहकों को अग्रिम भुगतान के बाद कूरियर से सामान भेजा जाता है। कुशीनगर, देवरिया, महराजगंज और गोरखपुर में अपने माध्यम से उत्पाद पहुंचाए जाते हैं। सरिता के इंस्टाग्राम पर करीब 1.36 लाख और फेसबुक पर लगभग 78 हजार फॉलोअर हैं। जीएसटी पंजीकरण के बाद अब अमेजन पर भी उत्पाद बेचने की तैयारी है।

एनआरएलएम से जुड़कर 350 महिलाओं तक पहुंचा कारोबार

राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (एनआरएलएम) से जुड़ने के बाद कारोबार को नई दिशा मिली। विशुनपुरा ब्लॉक में बीएमएम से संपर्क के बाद सरिता को स्वयं सहायता समूह के बारे में जानकारी मिली। इसके बाद कमला महिला स्वयं सहायता समूह, माधोपुर बलकुड़िया का गठन हुआ। सरिता ने उत्तर प्रदेश और बिहार में 50 से अधिक समूहों को जोड़ने में भूमिका निभाई। आज अलग-अलग गांवों की करीब 350 महिलाएं इस काम से जुड़ी हैं। अकेले माधोपुर और घूर छपरा की लगभग 150 महिलाएं मउनी-डलिया बनाती हैं।

ट्रेड शो तक पहुंचा गांव का हुनर

कमला का उद्योग विभाग में करीब पांच वर्ष पहले और सरिता का एनआरएलएम में दो वर्ष पहले पंजीकरण हुआ। दोनों नोएडा के इंटरनेशनल ट्रेड शो में भी हिस्सा ले चुके हैं। इससे उन्हें अपने उत्पादों को बड़े बाजार तक पहुंचाने और कारोबार विस्तार की संभावनाएं समझने का अवसर मिला। सरिता बताती हैं कि पहले मउनी-डलिया की बिक्री गांव और आसपास के बाजारों तक सीमित थी, लेकिन अब सोशल मीडिया के जरिए ग्राहक खुद संपर्क कर रहे हैं। गांव की पारंपरिक कला आज डिजिटल बाजार के सहारे नई पहचान बना रही है।

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