संवाददाता – त्रिलोकी नाथ राय
भांवरकोल/गाजीपुर। भारत की आजादी की लड़ाई में गाजीपुर के वीर सपूतों का योगदान स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज है। इन्हीं में शेरपुर कलां निवासी महज 14 वर्षीय क्रांतिकारी यमुना गिरि का नाम विशेष सम्मान से लिया जाता है। बाल्यावस्था में ही उन्होंने अंग्रेजी हुकूमत को चुनौती देकर अदम्य साहस और देशभक्ति की मिसाल कायम की।
महात्मा गांधी के आह्वान पर 9 अगस्त 1942 को शुरू हुए भारत छोड़ो आंदोलन की गूंज गाजीपुर तक पहुंची। यमुना गिरि ने 11 अगस्त को जिला मुख्यालय के सिटी हाई स्कूल, डीएवी स्कूल और विक्टोरिया गवर्नमेंट स्कूल समेत कई विद्यालयों के छात्रों को एकजुट कर आंदोलन का शंखनाद किया। अगले दिन विद्यालयों में हड़ताल करा दी गई।
13 अगस्त तक बनाई गई रणनीति के अनुसार 14 अगस्त 1942 को यमुना गिरि अपने साथी चांदपुर निवासी राम विशुन राय उर्फ विसुनी राय और अन्य सहयोगियों के साथ गौसपुर हवाई अड्डे पहुंचे। वहां उन्होंने हवाई अड्डे तथा कर्मचारियों की आवासीय झोपड़ियों में आग लगा दी। सुरक्षा में तैनात अंग्रेज सिपाहियों ने फायरिंग कर दी। गोली लगने से यमुना गिरि घायल होकर बेहोश हो गए, जबकि उनके साथी राम विशुन राय भी घायल हुए।
अगले दिन यमुना गिरि को अंग्रेज मजिस्ट्रेट मुनरो के सामने पेश किया गया। उन्हें माफी मांगने पर रिहा करने का प्रस्ताव दिया गया, लेकिन आजादी के इस जांबाज सपूत ने माफी मांगने से साफ इनकार कर दिया। अंग्रेजी अदालत ने उन्हें पांच वर्ष के सश्रम कारावास की सजा सुनाकर जिला जेल भेज दिया। बाद में उन्हें सीतापुर जेल स्थानांतरित कर दिया गया।
देश को 15 अगस्त 1947 को आजादी मिली। पांच वर्ष की सजा पूरी करने के बाद जेल से बाहर आए यमुना गिरि को बाद में पुलिस विभाग में एएसआई के पद पर नियुक्त किया गया। 6 जून 1969 को उन्होंने अंतिम सांस ली।
यमुना गिरि की वीरता इस बात की मिसाल है कि स्वतंत्रता संग्राम में उम्र कभी साहस के आड़े नहीं आई। महज 14 वर्ष की उम्र में अंग्रेजी हुकूमत को चुनौती देने वाले इस बाल वीर की क्रांतिकारी गाथा आज भी गाजीपुर के गौरवशाली स्वतंत्रता आंदोलन की अमूल्य विरासत का हिस्सा है।
