करइल के खेतों में धान की नर्सरी की रौनक, लेकिन घटती पैदावार ने बढ़ाई किसानों की चिंता


भांवरकोल। पूर्वांचल के अन्न भंडार के रूप में पहचान रखने वाले करइल क्षेत्र में खरीफ सीजन की शुरुआत के साथ ही किसानों ने धान की नर्सरी तैयार करने का काम तेज कर दिया है। खेतों में हर तरफ हरियाली की तैयारी दिखाई देने लगी है और किसान पूरे उत्साह के साथ धान की नर्सरी कि तैयारी में जुटे हुए हैं। सरकारी समर्थन मूल्य, सिंचाई के लिए अपेक्षाकृत बेहतर बिजली व्यवस्था तथा उपजाऊ भूमि के कारण हर वर्ष बड़े पैमाने पर धान की खेती की जाती है।

करइल क्षेत्र के अधिकांश किसानों की आजीविका कृषि पर निर्भर है। ऐसे में धान की फसल यहां की ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ मानी जाती है। किसान इस समय नर्सरी तैयार करने, खेतों की जुताई, खाद और बीज की व्यवस्था में लगे हुए हैं। हालांकि धान की खेती को लेकर किसानों के मन में एक बड़ी चिंता भी बनी हुई है। पिछले दो से तीन वर्षों के दौरान धान की पैदावार में लगातार गिरावट दर्ज की गई है, जिससे किसान परेशान हैं।

किसानों का कहना है कि फसल बढ़वार के दौरान खेतों में धान की फसल काफी अच्छी दिखाई देती है। पौधे हरे-भरे रहते हैं और बालियां भी भरपूर नजर आती हैं, लेकिन जब कटाई का समय आता है तो उत्पादन उम्मीद के अनुरूप नहीं निकलता। कई किसानों ने बताया कि पहले जहां प्रति बीघा अधिक पन्द्रह से अठारह कुंतल उपज प्राप्त होती थी, वहीं अब उत्पादन घटकर लगभग 8 से 10 कुंतल प्रति बीघा तक सिमट गया है।

क्षेत्र के किसानों का मानना है कि धान की बालियों को नुकसान पहुंचाने वाले कीटों का प्रकोप भी उत्पादन में कमी का एक प्रमुख कारण हो सकता है। किसानों के अनुसार फसल पकने के अंतिम चरण में कुछ कीट बालियों को काटकर खेत में गिरा देते हैं, जिससे बड़ी मात्रा में धान नष्ट हो जाता है। इसके अलावा मौसम में हो रहे बदलाव, मिट्टी की उर्वरा शक्ति में कमी तथा बढ़ती लागत भी किसानों की मुश्किलें बढ़ा रही हैं।

किसानों ने कृषि वैज्ञानिकों और कृषि विभाग से इस समस्या का वैज्ञानिक अध्ययन कर समाधान निकालने की मांग की है। उनका कहना है कि यदि समय रहते कारणों की पहचान कर उचित सलाह और तकनीकी सहायता उपलब्ध कराई जाए तो धान उत्पादन में फिर से वृद्धि संभव है।

फिलहाल करइल के किसान बेहतर मौसम और अच्छी फसल की उम्मीद के साथ धान की नर्सरी तैयार करने में जुटे हैं। सभी की नजरें मानसून पर टिकी हैं, क्योंकि समय पर बारिश और अनुकूल मौसम ही इस वर्ष की फसल की सफलता तय करेगा।

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