गाजीपुर जनपद के मुहम्मदाबाद तहसील क्षेत्र के प्रधान की बरेजी में आयोजित संगीतमय श्रीमद्भागवत कथा में अयोध्या से पधारे मानस मर्मज्ञ भागवत वेत्ता श्री श्री 1008 महामंडलेश्वर श्री शिवराम दास जी फलाहारी बाबा ने कहा की
कथा और सत्संग भी एक दर्पण है जो आंतरिक चेहरे को दिखाता है और साफ करने का मौका परमात्मा की कृपा से प्राप्त होता है। फलाहारी बाबा ने कहा की कथा और सत्संग से कभी भी मन भरना नहीं चाहिए। स्वर्ग का अमृत यदि अमरत्व देता है तो कथा रूपी अमृत अभयत्व प्रदान करता है। राधा का अर्थ बताते हुए फलाहारी बाबा ने कहा कि कृष्णेन अराध्यते इति राधा। जिसकी आराधना स्वयं श्री कृष्णा करते हो उसी का नाम राधा है त्री शक्ति में सर्वश्रेष्ठ शक्ति अहृल्दिनी शक्ति का नाम राधा है। रा का अर्थ दान वाचक धा का अर्थ निर्वाण वाचक होता है यानी जो सदा ही निर्वाण का दान करती हो उसी का नाम राधा है। श्री राधा जी भगवान कृष्ण के प्राण से प्रकट हुई इसलिए प्राणवल्लभा कहा जाता है। सुशीला के द्वारा भेजा हुआ सुदामा जी का तंदुल दो मुट्ठी खाकर भगवान द्वारकाधीश ने दो लोक दिया तीसरी मुट्ठी खाने वाले थे कि रुक्मणी महारानी ने हाथ पकडकर कहा कि हे प्राणनाथ अमीरी के कब्र पर पनपी हुई गरीबी बड़ी जहरीली होती है। क्या सुदामा को द्वारकाधीश बनाकर आप स्वयं सुदामा बनना चाहते हो। मंच से विदा लेते हुए बाबा ने कहा कि कुत्ता अकेला होता है इसलिए पत्थर मारने पर भाग जाता है किंतु मधुमक्खियों पर पत्थर मारने से पत्थर मारने वाले को ही भागने पर एकता होने के कारण मधुमक्खियां मजबूर कर देती है। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है अतः समाज में एकता होनी चाहिए। कथा और यज्ञ का लक्ष्य अनेकता में एकता प्रेम का विजारोपण और धर्म का जागरण होता है। जो अपने जीवन में सामाजिकता नैतिकता धार्मिकता और आस्तिकता का महत्व देता है वह अर्थ धर्म काम और मोक्ष चारों को प्राप्त कर लेता है।
