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	<title>एक्सक्लूसिव Archives - Lokadhikar News</title>
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	<title>एक्सक्लूसिव Archives - Lokadhikar News</title>
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		<title>कब्र से निकाले प्रमाण, सिस्टम बेपरवाह?</title>
		<link>https://lokadhikarnews.com/ghazipur-1823/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[लोक अधिकार न्यूज़]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 28 Apr 2026 13:04:35 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[एक्सक्लूसिव]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>एक्सक्लूसिव: ओडिशा की यह घटना केवल एक विचलित करने वाली खबर नहीं है, बल्कि उस कठोर सच्चाई का आईना है&#8230;</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>एक्सक्लूसिव: </strong>ओडिशा की यह घटना केवल एक विचलित करने वाली खबर नहीं है, बल्कि उस कठोर सच्चाई का आईना है जिसमें एक आम नागरिक और व्यवस्था के बीच की दूरी साफ दिखाई देती है। एक व्यक्ति को अपनी ही बहन की मृत्यु का प्रमाण देने के लिए कब्र से शव निकालकर लाना पड़ा, सिर्फ इसलिए कि वह 19000 रूपये जैसी मामूली राशि तक पहुंच सके। यह केवल एक व्यक्ति की विवशता नहीं, बल्कि उस सिस्टम की तस्वीर है जो कागज़ों में आधुनिक और जनहितैषी होने का दावा करता है, लेकिन जमीनी स्तर पर कई बार इंसानियत से कोसों दूर नजर आता है।</p>
<p>सोचने वाली बात यह है कि किसी भी व्यक्ति के जीवन में अपने परिजन की मृत्यु सबसे बड़ा दुख होता है। ऐसे समय में उसे सहारे की जरूरत होती है, न कि सवालों और कागज़ी बाधाओं की दीवारों की। लेकिन हमारे प्रशासनिक और बैंकिंग तंत्र में अक्सर यही होता है कि संवेदनशील परिस्थितियों को भी एक फाइल या केस नंबर में बदल दिया जाता है। इस घटना में भी यही हुआ। नियमों का हवाला दिया गया, दस्तावेज़ मांगे गए, और अंततः एक व्यक्ति को अपनी गरिमा और भावनाओं को दरकिनार कर ऐसा कदम उठाना पड़ा जिसे किसी भी सभ्य समाज में कल्पना तक नहीं की जा सकती।</p>
<p>19000 की रकम किसी बड़े आर्थिक लेनदेन का हिस्सा नहीं है। यह कोई ऐसी राशि नहीं है जिसके लिए अत्यधिक सख्ती और जटिल सत्यापन की आवश्यकता हो। लेकिन जब यही छोटी राशि एक गरीब या जरूरतमंद व्यक्ति के लिए जीवन का सहारा बन जाती है, तब उसकी अहमियत कई गुना बढ़ जाती है। यही वह बिंदु है जहां सिस्टम को संवेदनशील होना चाहिए था, लेकिन वह असफल रहा। यह विफलता केवल प्रक्रियाओं की नहीं, बल्कि सोच और दृष्टिकोण की भी है।</p>
<p>यहां एक बड़ा और कड़वा विरोधाभास भी सामने आता है। देश ने ऐसे कई उदाहरण देखे हैं जहां बड़े आर्थिक घोटालों में शामिल लोग, जैसे नीरव मोदी और विजय माल्या, हजारों करोड़ रुपये के मामलों में भी लंबे समय तक कानूनी प्रक्रियाओं का लाभ उठाते रहे, सिस्टम की खामियों का फायदा उठाकर देश से बाहर चले गए, और आज भी न्यायिक प्रक्रिया अपने अंतिम निष्कर्ष तक पहुंचने के लिए संघर्ष कर रही है। ऐसे मामलों में नियम और कानून कई बार इतने लचीले और जटिल हो जाते हैं कि वे एक कठपुतली के खेल जैसे प्रतीत होते हैं, जहां ताकत और संसाधन रखने वाले लोग उन्हें अपने हिसाब से मोड़ लेते हैं।</p>
<p>वहीं दूसरी ओर, एक आम नागरिक को अपने ही परिवार की मृत्यु का प्रमाण देने के लिए इस हद तक जाना पड़े कि वह कब्र से शव निकालकर लाए, तो यह असमानता केवल आर्थिक नहीं, बल्कि नैतिक और प्रशासनिक भी है। यह दर्शाता है कि नियमों का बोझ सबसे ज्यादा उसी पर पड़ता है जिसके पास न तो संसाधन हैं और न ही सिस्टम को समझने या उससे लड़ने की क्षमता।</p>
<p>यह कहना गलत नहीं होगा कि हमारे यहां नियम और कानून कई बार अपने मूल उद्देश्य से भटक जाते हैं। उनका उद्देश्य व्यवस्था बनाए रखना और धोखाधड़ी को रोकना होता है, लेकिन जब वे इंसान की बुनियादी गरिमा और संवेदनाओं को ही कुचलने लगें, तो उनकी उपयोगिता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।</p>
<p>नियमों का पालन आवश्यक है, लेकिन उनका मानवीकरण उससे भी अधिक आवश्यक है। मानवीकरण का अर्थ यह नहीं है कि नियमों को समाप्त कर दिया जाए या पूरी तरह ढील दे दी जाए। इसका अर्थ यह है कि हर मामले को एक ही नजर से न देखा जाए। स्थानीय स्तर पर अधिकारियों को यह अधिकार और प्रशिक्षण मिलना चाहिए कि वे परिस्थितियों के अनुसार निर्णय ले सकें। यदि किसी व्यक्ति के पास अस्पताल का रिकॉर्ड, पंचायत का प्रमाण या स्थानीय गवाह मौजूद हैं, तो उन्हें पर्याप्त माना जाना चाहिए। हर बार कागज़ी औपचारिकताओं को अंतिम सत्य मान लेना न केवल अव्यावहारिक है, बल्कि कई बार अमानवीय भी हो जाता है।</p>
<p>डिजिटल इंडिया और ई-गवर्नेंस जैसे प्रयास तभी सफल माने जाएंगे जब उनका लाभ उस अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे जो सबसे अधिक जरूरतमंद है। यदि एक ग्रामीण या गरीब नागरिक को अभी भी अपने अधिकारों के लिए इस तरह के कदम उठाने पड़ रहे हैं, तो यह संकेत है कि सुधार अभी अधूरा है। केवल पोर्टल और ऐप बना देने से व्यवस्था जनहितैषी नहीं बनती, जब तक कि उसमें मानवीय संवेदना और व्यावहारिक लचीलापन न जोड़ा जाए।</p>
<p>इस घटना को केवल एक अपवाद मानकर नजरअंदाज करना आसान होगा, लेकिन ऐसा करना खतरनाक भी है। क्योंकि यह एक बड़ी समस्या का छोटा सा उदाहरण है। देश के कई हिस्सों में लोग आज भी छोटे-छोटे कामों के लिए लंबी प्रक्रियाओं, बार-बार सत्यापन और अनावश्यक बाधाओं का सामना करते हैं। कई बार वे हार मान लेते हैं, कई बार वे समझौता कर लेते हैं, और कभी-कभी, जैसा कि इस मामले में हुआ, वे ऐसे कदम उठा लेते हैं जो पूरे समाज को झकझोर देते हैं।</p>
<p>यह भी जरूरी है कि हम इस घटना को केवल प्रशासन की गलती के रूप में न देखें, बल्कि इसे एक व्यापक सुधार के अवसर के रूप में लें। बैंकिंग और प्रशासनिक तंत्र को यह समझना होगा कि हर ग्राहक या नागरिक एक केस फाइल नहीं है, बल्कि एक इंसान है जिसकी अपनी परिस्थितियां, भावनाएं और सीमाएं हैं। नियमों को इस तरह से डिजाइन किया जाना चाहिए कि वे लोगों की मदद करें, न कि उन्हें और अधिक कठिनाइयों में धकेलें।</p>
<p>अंततः, यह सवाल केवल 19000 रूपये का नहीं है, बल्कि उस सम्मान और गरिमा का है जो हर नागरिक का अधिकार है। जब एक व्यक्ति को अपनी बहन की लाश तक को सबूत के रूप में पेश करना पड़े, तो यह केवल एक व्यक्तिगत त्रासदी नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की संवेदनहीनता का प्रतीक बन जाती है। यह हमें याद दिलाता है कि विकास केवल आर्थिक आंकड़ों से नहीं मापा जाता, बल्कि इस बात से मापा जाता है कि वह सबसे कमजोर व्यक्ति के जीवन को कितना आसान और सम्मानजनक बनाता है।</p>
<p>यदि हमें वास्तव में एक न्यायपूर्ण और संवेदनशील समाज बनाना है, तो नियमों और कानूनों का मानवीकरण अब विकल्प नहीं, बल्कि आवश्यकता बन चुका है। जब तक व्यवस्था आम आदमी के दर्द को समझना और उसके अनुरूप खुद को ढालना नहीं सीखेगी, तब तक ऐसी घटनाएं केवल खबरें बनकर नहीं रहेंगी, बल्कि हमारे सामाजिक और प्रशासनिक ताने-बाने पर लगातार सवाल उठाती रहेंगी।</p>
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			</item>
		<item>
		<title>सुरों की सदाबहार आवाज़ खामोश: आशा भोसले का 92 वर्ष की उम्र में निधन</title>
		<link>https://lokadhikarnews.com/exclusive-2/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[लोक अधिकार न्यूज़]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 12 Apr 2026 16:03:08 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[एक्सक्लूसिव]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>मुंबई: भारतीय संगीत जगत के लिए आज का दिन बेहद दुखद रहा। दिग्गज पार्श्व गायिका आशा भोसले का रविवार दोपहर&#8230;</p>
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]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>मुंबई:</strong> भारतीय संगीत जगत के लिए आज का दिन बेहद दुखद रहा। दिग्गज पार्श्व गायिका आशा भोसले का रविवार दोपहर मुंबई के ब्रीच कैंडी अस्पताल में निधन हो गया। वह 92 वर्ष की थीं। बताया जा रहा है कि पिछले कुछ दिनों से उनकी तबीयत ठीक नहीं थी और चेस्ट इंफेक्शन के बाद उन्हें शनिवार शाम अस्पताल में भर्ती कराया गया था। इलाज के दौरान उनकी स्थिति गंभीर होती गई और अंततः मल्टी-ऑर्गन फेल्योर के कारण उन्होंने अंतिम सांस ली।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p style="text-align: center">
<figure id="attachment_10555" aria-describedby="caption-attachment-10555" style="width: 1080px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://lokadhikarnews.com/wp-content/uploads/2026/04/Picsart_26-04-12_21-42-55-939.jpg"><img fetchpriority="high" decoding="async" class="size-full wp-image-10555" src="https://lokadhikarnews.com/wp-content/uploads/2026/04/Picsart_26-04-12_21-42-55-939.jpg" alt="" width="1080" height="1620" /></a><figcaption id="caption-attachment-10555" class="wp-caption-text"><span style="color: #ff0000"><strong><span style="font-size: 16px">परिवार की ओर से दी गई जानकारी के अनुसार, उनके पार्थिव शरीर को अस्पताल से घर लाया गया है, जहां सोमवार सुबह 11 बजे से अंतिम दर्शन के लिए रखा जाएगा। इसके बाद शाम 4 बजे मुंबई के शिवाजी पार्क में उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा, जिसमें उन्हें राजकीय सम्मान के साथ विदाई दी जाएगी।</span></strong></span></figcaption></figure>
<p>आशा भोसले ने अपने सात दशकों से अधिक लंबे करियर में भारतीय संगीत को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया। उन्होंने फिल्मी गीतों से लेकर ग़ज़ल, भजन, पॉप और क्लासिकल संगीत तक हर शैली में अपनी अमिट छाप छोड़ी। 20 से अधिक भाषाओं में 12 हजार से ज्यादा गाने गाकर उन्होंने एक ऐसा रिकॉर्ड बनाया, जिसे छू पाना आसान नहीं है।</p>
<p>उनकी पहचान सिर्फ एक गायिका के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐसे युग के रूप में रही, जिसने भारतीय सिनेमा के संगीत को वैश्विक पहचान दिलाई। ‘दम मारो दम’, ‘पिया तू अब तो आजा’ और ‘चुरा लिया है तुमने’ जैसे गीत आज भी संगीत प्रेमियों की जुबान पर हैं।</p>
<p>आशा भोसले का जन्म एक संगीत परिवार में हुआ था। वह प्रसिद्ध गायक दीनानाथ मंगेशकर की बेटी और महान गायिका लता मंगेशकर की छोटी बहन थीं। कम उम्र में ही पिता के निधन के बाद उन्होंने अपनी बहन के साथ मिलकर परिवार की जिम्मेदारी संभाली और यहीं से उनके संगीत सफर की शुरुआत हुई।</p>
<p>उनके निधन पर देशभर में शोक की लहर है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सहित कई नेताओं, कलाकारों और संगीतकारों ने उन्हें श्रद्धांजलि दी है। सभी ने एक स्वर में कहा कि आशा भोसले का जाना भारतीय संगीत के एक स्वर्णिम अध्याय का अंत है।</p>
<p>संगीत जगत की यह महान आवाज भले ही अब हमारे बीच नहीं रही, लेकिन उनके गीत हमेशा लोगों के दिलों में गूंजते रहेंगे।</p>
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			</item>
		<item>
		<title>&#8216;हाकी के तूफान&#8217; धनराज पिल्लै का सफरनामा कहा &#8220;माँ के आशीर्वाद से ही यहाँ तक पहुंचा हूँ&#8221;</title>
		<link>https://lokadhikarnews.com/exclusive/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[लोक अधिकार न्यूज़]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 21 Feb 2026 18:59:32 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[एक्सक्लूसिव]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>लोक अधिकार समाचार के संवाददाता सारंग राय से गाजीपुर में हुई साक्षात्कार के अंश साक्षात्कारकर्ता: सर, आपके करियर की शुरुआत&#8230;</p>
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]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><span style="color: #ff0000"><strong>लोक अधिकार समाचार के संवाददाता सारंग राय से गाजीपुर में हुई साक्षात्कार के अंश</strong></span></p>
<p><strong>साक्षात्कारकर्ता:</strong> सर, आपके करियर की शुरुआत टूटी हुई हॉकी स्टिक और सीमित संसाधनों से हुई थी। आज के आधुनिक दौर में, जहाँ टर्फ मैदान और महंगे उपकरण आम हैं, आप उस पुराने दौर से आज के बदलाव को कैसे देखते हैं?</p>
<p><strong>धनराज पिल्लै:</strong> देखिए, दौर पूरी तरह बदल चुका है। आज बच्चे जिस ग्रेफाइट स्टिक से खेल रहे हैं, वो लकड़ी की हॉकी जैसी नहीं रही। एक अच्छी हॉकी स्टिक की कीमत आज 10 हजार रुपये तक है, और शुरुआत करने के लिए भी कम से कम 5 हजार की स्टिक चाहिए होती है। हमारे समय में लकड़ी की हॉकी होती थी, जो दो हिस्सों में आती थी। अक्सर जब ब्लेड टूट जाता था, तो हम किसी पुरानी स्टिक का ब्लेड जोड़कर, उसे बांधकर खेलते थे। संसाधन कम थे, लेकिन हम इसलिए खेलते थे क्योंकि हमारे अंदर जुनून और लगन थी। पुणे के खड़की में, जहाँ मैं पला-ब बढ़ा, वहाँ का माहौल ही ऐसा था—वहाँ सिर्फ और सिर्फ हॉकी ही जीवन था।</p>
<p><strong>साक्षात्कारकर्ता:</strong> आपकी बायोग्राफी <span style="color: #ff0000"><strong>फॉरगिव मि अम्मा</strong></span> काफी चर्चित रही है। खड़की की गलियों से लेकर अंतरराष्ट्रीय मंच तक के इस सफर में आपकी माता जी और परिवार का क्या योगदान रहा?</p>
<p><strong>धनराज पिल्लै:</strong> आज मैं जहाँ भी खड़ा हूँ, उसका पूरा श्रेय मेरी माँ को जाता है। बेशक, मेरे भाइयों और दोस्तों का भी इसमें बड़ा हाथ रहा है। मैं यह नहीं कहूँगा कि मैंने अकेले सब कुछ किया; मेरे साथियों (टीममेट्स) का योगदान भी उतना ही महत्वपूर्ण है। जैसे अंबुज, जो सालों तक मेरे साथ इंडिया कैंप में रहे। हॉकी एक टीम गेम है, और जब आप तालमेल के साथ चलते हैं, तो न केवल आप देश का प्रतिनिधित्व करते हैं, बल्कि एक बेहतर नागरिक भी बनते हैं।</p>
<p><strong><span style="color: #000000">साक्षात्कारकर्ता: </span></strong>आपको आपकी रफ़्तार के लिए &#8216;तूफान&#8217; कहा जाता था। क्या यह रफ़्तार नेचुरल थी या इसके पीछे कोई विशेष प्रशिक्षण था?</p>
<p><strong>धनराज पिल्लै:</strong> यह काफी हद तक नेचुरल था। मेरे पिता और सभी भाई स्प्रिन्टर (धावक) थे। घर का माहौल ऐसा था कि हर भाई फॉरवर्ड लाइन में ही खेलता था। मेरे बड़े भाई रमेश पिल्लै जी देश के लिए खेले थे, उन्हें देखकर मुझे प्रेरणा मिली कि अगर मैं भी कड़ी मेहनत करूँ, तो मैं भी उस स्तर तक पहुँच सकता हूँ। बस इसी सोच के साथ खेलता गया और कब 15 साल बीत गए, पता ही नहीं चला।</p>
<p><strong>साक्षात्कारकर्ता:</strong> आर्थिक रूप से परिवार बहुत मजबूत नहीं था, इसके बावजूद आपने हॉकी को ही करियर के रूप में क्यों चुना?</p>
<p><strong>धनराज पिल्लै:</strong> जब मेरे बड़े भाई रमेश और गणेश की नौकरी लगी, तो घर की स्थिति थोड़ी सुधरी। लेकिन सरकारी तनख्वाह में माता-पिता, चार भाई, एक बहन और दादा-दादी का पूरा परिवार चलाना पिताजी के लिए कठिन था। मेरी माँ ने घर को संभाला। जब मेरी नौकरी लगी और मैं देश के लिए खेलने लगा, तब स्थिति बेहतर हुई। 1992 के बाद जब मैंने विदेशी लीग्स खेलना शुरू किया, तब आर्थिक रूप से स्थिरता आई। उस समय हमें डेढ़-दो महीने के लिए 1 से 2 लाख रुपये मिलते थे, जो उस दौर में हमारे लिए बहुत बड़ी बात थी।</p>
<p><strong>साक्षात्कारकर्ता:</strong> आप भारत के इकलौते खिलाड़ी हैं जिन्होंने 4 ओलंपिक और 4 विश्व कप खेले हैं। आज के दौर में भी आपकी फिटनेस और निरंतरता (Consistency) का राज क्या है?</p>
<p><strong>धनराज पिल्लै:</strong> इसका सबसे बड़ा कारण अनुशासित जीवनशैली है। मुझे किसी भी प्रकार का नशा, चाहे वो शराब हो या सिगरेट, छूने की आदत नहीं रही। मेरे अंदर सिर्फ खेल का जुनून था। हम सुबह 4 घंटे और शाम को 4 बजे से अंधेरा होने तक अभ्यास करते थे। उस समय हमारे सीनियर्स हमें गाइड करते थे। सुबैया साहब, आशीष बलाल और मार्क पैटरसन जैसे दिग्गजों के साथ खेलने का मौका मिला। 50-50 लड़कों के कैंप में अपनी जगह बनाना आसान नहीं था, लेकिन जिसने मेहनत की, उसने अपना मुकाम हासिल किया।</p>
<p><strong>साक्षात्कारकर्ता:</strong> आपकी छवि एक आक्रामक और बेबाक खिलाड़ी की रही है। क्या फेडरेशन या सिस्टम के खिलाफ बोलने का आपको कभी नुकसान उठाना पड़ा?</p>
<p><strong>धनराज पिल्लै:</strong> जी, बहुत ज्यादा नुकसान हुआ। मैंने 4 ओलंपिक, 4 वर्ल्ड कप, 4 एशियन गेम्स और लगभग 400 मैच खेलकर 200 के करीब गोल किए हैं। इसके बावजूद, मुझसे कम अनुभव वाले खिलाड़ियों को पद्मश्री और अन्य सम्मान मिले, जबकि मेरे आंकड़े पद्म भूषण के हकदार थे। मैं हमेशा फेडरेशन से खिलाड़ियों के हक के लिए लड़ता रहा। कई बार मुझे बाहर करने की कोशिश की गई, लेकिन मेरा खेल इतना मजबूत था कि वे मुझे नजरअंदाज नहीं कर सके। जैसा कि कहा गया है— &#8220;ख़ुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले, ख़ुदा बंदे से ख़ुद पूछे, बता तेरी रज़ा क्या है।&#8221; मैंने अपनी किस्मत खुद लिखी। मैं चाहता तो और भी खेल सकता था, लेकिन जो मिला, मैं उसमें खुश हूँ।</p>
<p><strong>साक्षात्कारकर्ता:</strong> आपकी बातों से लगता है कि आपको मलाल है कि सरकार या फेडरेशन ने आपके साथ उचित न्याय नहीं किया?</p>
<p><strong>धनराज पिल्लै:</strong> अब उम्र के इस पड़ाव पर नाराजगी नहीं है, लेकिन यह मलाल जरूर रहता है कि सम्मान उसे मिलना चाहिए जो उसका असली हकदार (डिजर्विंग) हो। आज के दौर में सोशल मीडिया और दिखावा ज्यादा है। हमारे समय में यह सब नहीं था। मैं आज के युवाओं से यही कहता हूँ कि अगर आप सोशल मीडिया से दूर रहकर वही समय मैदान पर देंगे, तो आपकी खेल में मास्टरी हो जाएगी।</p>
<p><strong>साक्षात्कारकर्ता:</strong> आपकी किताब का शीर्षक &#8216;Forgive Me Amma&#8217; (मुझे माफ़ करना माँ) बहुत भावुक है। इसके पीछे की क्या कहानी है?</p>
<p><strong>धनराज पिल्लै:</strong> यह सिडनी ओलंपिक (2000) की बात है। हमारी टीम बहुत मजबूत थी और हम पदक के बहुत करीब थे। पोलैंड के खिलाफ मैच में हमें जीतना था, लेकिन वह मैच 1-1 से ड्रॉ हो गया और हम सेमीफाइनल की दौड़ से बाहर हो गए। मैंने घर से वादा किया था कि यह मेरा आखिरी ओलंपिक होगा और मैं मेडल लेकर लौटूंगा। जब हम हार गए, तो मैंने माँ को फोन किया और रोते हुए कहा, &#8220;माँ, मुझे माफ़ कर देना, मैं मेडल नहीं ला पाया।&#8221; उस समय मेरे रूममेट हरिंदर ने फोन ठीक से नहीं काटा था और पत्रकार संदीप मिश्रा ने वह पूरी भावुक बातचीत सुन ली थी। उसी घटना पर उन्होंने यह शीर्षक दिया।</p>
<p><strong>साक्षात्कारकर्ता:</strong> आखिरी सवाल, भारतीय हॉकी के भविष्य को आप कैसे देखते हैं?</p>
<p><strong>धनराज पिल्लै:</strong> भारतीय हॉकी का भविष्य उज्ज्वल है। टीम ने बैक-टू-बैक ओलंपिक मेडल जीते हैं। बस मेरी यही सलाह है कि विवादों से दूर रहें। अभी मनप्रीत सिंह जैसे खिलाड़ी, जो पूरी तरह फिट हैं और अनुभवी हैं, उन्हें 2026 विश्व कप तक मौका मिलना चाहिए। रिकॉर्ड तो टूटने के लिए ही बनते हैं। जैसे सचिन के रिकॉर्ड विराट या रोहित तोड़ रहे हैं, वैसे ही हॉकी में भी नए कीर्तिमान स्थापित होने चाहिए। जब तक स्वस्थ प्रतिस्पर्धा रहेगी, देश का खेल आगे बढ़ता रहेगा।</p>
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			</item>
		<item>
		<title>ट्रेन से गिरकर मजदूर की मौत, परिवार में मचा कोहराम</title>
		<link>https://lokadhikarnews.com/ghazipur-710/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[लोक अधिकार न्यूज़]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 01 Oct 2025 14:50:49 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[एक्सक्लूसिव]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>कासिमाबाद थाने के पट्टीगढ़ के एक व्यक्ति का पुणे में ट्रेन से गिरकर मौत, मौत की सूचना पर परिवार में&#8230;</p>
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]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>कासिमाबाद थाने के पट्टीगढ़ के एक व्यक्ति का पुणे में ट्रेन से गिरकर मौत, मौत की सूचना पर परिवार में मचा कोहराम मच गया व पूरे मोहल्ले में शोक की लहर दौड़ गई।</strong></p>
<p><strong>प्राप्त जानकारी के अनुसार क्षेत्र के पट्टीगढ़ निवासी लल्लन राम उम्र 48 वर्ष पुत्र जगदीश राम पुणे में रहकर पलंबर का काम करता था जिससे उसके परिवार का जीवकोपार्जन चलता था वह काम की तलाश में बाहर गए थे परन्तु करने के बाद भी ठेकेदार द्वारा पैसा न देने पर उनका मन उचट गया और वह वापस घर के लिए ट्रेन पकड़ लिए और संयोग वश दरवाजे पर खड़े होकर सफ़र कर रहा था कि अचानक ट्रेन से उसका पैर फिसल गया जिससे व रेल के पटरी पर गिर गया तत्काल इसकी वहीं मौके पर मौत हो गई। जिसकी सूचना जी आर पी एफ ने परिजनों को मौत की सूचना दी । जिससे मौत की सूचना सुनकर परिवार में दुख का पहाड़ टूट पड़ा परिवार के लोगों का रोते, बिलखते व शोर शराबे की आवाज सुनकर मोहल्ले के लोग लल्लन के घर पहुंचे तो उन्हें इस घटनाक्रम का पता चला। इस घटना से पूरे मोहल्ले में शोक व्याप्त है मृतक अपने पीछे अपनी पत्नी समेत तीन पुत्रियां तथा एक पुत्र छोड़ गया है जिसमें से दो लड़कियों की शादी हो चुकी है।</strong></p>
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		<item>
		<title>विमान से उतरते ही प्रधानमंत्री मोदी ने वाराणसी में बलात्कार की घटना का लिया संज्ञान</title>
		<link>https://lokadhikarnews.com/pm-modi-varanasi/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[लोक अधिकार न्यूज़]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 11 Apr 2025 06:32:56 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[एक्सक्लूसिव]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>दोषियों पर सख्त कार्रवाई के निर्देश वाराणसी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार को अपने वाराणसी दौरे के दौरान विमान से&#8230;</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>दोषियों पर सख्त कार्रवाई के निर्देश</strong></p>
<p><strong>वाराणसी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार को अपने वाराणसी दौरे के दौरान विमान से उतरते ही शहर में कुछ दिन पूर्व घटी सामूहिक बलात्कार की घटना पर गंभीर चिंता जताते हुए त्वरित और कड़ा रुख अपनाया है। वाराणसी एयरपोर्ट पर उतरते ही उन्होंने पुलिस आयुक्त, मंडलायुक्त और जिलाधिकारी से इस मामले में विस्तृत जानकारी ली। प्रधानमंत्री ने अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिए कि इस जघन्य अपराध के सभी दोषियों को चिह्नित कर उन पर कड़ी से कड़ी कार्रवाई सुनिश्चित की जाए। इसके साथ ही, उन्होंने भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए व्यापक और प्रभावी व्यवस्थाएं करने पर जोर दिया। बीते दिनों वाराणसी में 19 वर्षीय युवती के साथ सामूहिक दुष्कर्म का मामला सामने आया है। इस मामले में पुलिस ने 12 नामजद सहित 11 अज्ञात युवकों के खिलाफ मामला दर्ज किया है। इस मामले में अबतक 9 आरोपियों की गिरफ्तारी हो चुकी है। अन्य फरार आरोपियों की तलाश जारी है।</strong></p>
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